खास बातचीत:डायरेक्टर-राइटर आरंभ सिंह बोले-OTT प्लेटफॉर्म एक सर्वाइवल मीडियम बन गया है मुंबई लेखक: ज्योति शर्मा - AKB NEWS

खास बातचीत:डायरेक्टर-राइटर आरंभ सिंह बोले-OTT प्लेटफॉर्म एक सर्वाइवल मीडियम बन गया है मुंबई लेखक: ज्योति शर्मा


 डायरेक्टर-राइटर आरंभ सिंह ने अब तक कई शॉर्ट फिल्म्स और वेब सीरीज बनाई हैं। इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के कई मंझे हुए डायरेक्टर्स को भी असिस्ट किया है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में आरंभ सिंह ने अपनी जर्नी, वेब शो, संजयलीला भंसाली और श्रीराम राघवन जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम करने के अपने अनुभव के बारे में भी बताया।

Q. 'जमाई' और 'जमाई 2. O'की जर्नी कैसे शुरू हुई ?
A. Zee5 में एक एक्सपेरिमेंट के तौर पर टेलीविजन के प्रोग्राम 'जमाई' को वेब शो में कन्वर्ट करने का सोचा, टेलीविजन की एक अलग ऑडियंस होती है। टेलीविजन शो पूरा परिवार एक साथ बैठकर देखता है। लेकिन वेब शो की बात करें तो सभी इंडिविजुअली देखते हैं। जब बात टीवी के किसी पॉपुलर शो को लेकर वेब शो बनाने की हुई, तब 'जमाई' एक ऐसा शो है जो लोगों को बहुत पसंद था। इस शो के किरदारों को लेकर नई कहानी बनाई गई, जिसे लोगों ने पसंद किया। ऑडियंस को पहला सीजन पसंद आया। इसलिए सीजन 2 लाया गया है। इन दोनों ही सीजन में टीवी शो की तरह ही सभी किरदारों को उसी तरह से पेश किया गया है। मगर वेब शो में एक्शन का तड़का भी देखने मिलेगा। टीवी सीरियल 'जमाई' को जिस तरह से वेब शो में कन्वर्ट किया गया, ठीक उसी तरह से टीवी के एक सीरियल 'कबूल है' का भी सीजन 2 यानी कि 'कबुल है 2.O' आ रहा है।

Q. डायरेक्टर्स के लिए OTT प्लेटफॉर्म कितना महत्वपूर्ण हो गया है?
A. OTT प्लेटफार्म एक सर्वाइवल मीडियम है। भले ही कोई कितने भी सीरियल या शॉर्ट फिल्में डायरेक्ट कर ले, उसे डायरेक्टर नहीं माना जाता है। जब तक वह कोई अच्छी फिल्म डायरेक्ट ना कर ले। और एक आउटसाइडर को डायरेक्शन के लिए किसी फिल्म का मिलना मुश्किल ही होता है। वेब का कंजम्पशन ज्यादा है और कोविड कि वजह से और बढ़ गया है। लॉकडाउन के चलते लोग ज्यादा वेब शो देखने लगे हैं। इस कारण कई नए और पुराने सभी डायरेक्टर्स को OTT पर अपनी कला दिखाने का मौका मिल रहा है।

Q. संजय लीला भंसाली और श्रीराम राघवन जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम किया है, इनकी खासियत बताएं क्या बड़े डायरेक्टर्स को असिस्ट करना मुश्किल होता है?
A. 
मैंने अपने करियर की शुरुआत संजय लीला भंसाली के साथ की थी। जो मेरी आखरी फिल्म मैंने असिस्ट की है वह श्रीराम राघवन जी के साथ 'बदलापुर' की थी। दोनों ही डायरेक्टर काफी अलग किस्म की फिल्में बनाते हैं। श्रीराम राघवन 'अंधाधुंध', 'बदलापुर' जैसी थ्रिलर साइकोलॉजिकल फिल्में बनाते हैं। यह उनका जोनर है, जिसमें उन्हें महारत हासिल है। वहीं भंसाली सर को लार्जर देन लाइफ जैसी फिल्में करना पसंद है। उनका कैनवास बहुत बड़ा रहता है, सेट बड़े होते हैं। ऐसे डायरेक्टर्स के साथ काम करने के बहुत फायदे होते हैं। फिल्म मेकिंग करने के बाद जब आप कोई काम करते हैं, उसके बाद आपको पता चल जाता है कि आप किस तरह के फिल्म मेकर हैं। लेकिन जब आप ऐसे डायरेक्टर के साथ काम करते हैं, तो मुश्किल तो नहीं आती है। लेकिन आपको सीखने का मौका बहुत मिलता है। भंसाली सर हो या श्री राम राघवन सर इनको असिस्ट करने से यह फायदा होता है कि आपको रियल टाइम एक्सपीरियंस होता है कि किस तरह से सीन को करना चाहिए। आप एक्टर को कैसे ब्रीफ कर सकते हैं, कैसे फ्रेमिंग की जाए ओर भी कई बातें आप सीखते हैं। उनके साथ काम करने से आप उनकी कई अच्छी क्वालिटीज अपना लेते हैं, जो आपको पता भी नहीं चलता। अब तक मैंने जो भी काम किया है, उसमें मेरी फ्रेमिंग को लेकर खूब तारीफ हुई है और यह चीज मैंने भंसाली सर से सीखी है। तो वहीं कम पैसों में बड़ा और अच्छा दिखाना मैंने श्रीराम राघवन सर से सीखा है। जैसे कि अगर आपने 40 रुपए लगाए हैं, तो आप को 240 रुपए का मुनाफा हो।

Q. डायरेक्शन फील्ड में आने का फैसला कब और कैसे लिया?
A. मैं बनारस शहर से हूं। मेरे माता-पिता सरकारी कर्मचारी थे। ऐसे परिवार में डायरेक्शन हो या फिल्म इंडस्ट्री की बात हो उनका सपोर्ट नहीं मिलता। इसके लिए मैंने पहले पढ़ाई पूरी की थी। उसके बाद जॉब करनी शुरू की, लेकिन पढ़ाई के साथ में थिएटर भी किया करता था। इतना ही नहीं जब मैं बनारस में रहा करता था, तब मैंने एक सीरियल भी किया है। जो उस समय दूरदर्शन पर आता था। मुझे लिखने का भी शौक है, मेरी 2 किताबे भी पब्लिश हो चुकी हैं। जिस परिवार से मैं हूं, वहां पर मैं यह कह नहीं सकता था कि मुझे फिल्म इंडस्ट्री में काम करना है। उसके लिए मुझे अपने आप को प्रूफ करना पड़ा था। पहले मैंने MBA किया, उसके बाद मैंने जॉब करना शुरू किया था। चार साल तक मैंने जॉब की और 2008 में मैंने नौकरी छोड़ दी थी। उस वक्त में 25 साल का था। मुझे एक US की कंपनी में बतौर इंडिया हेड जॉब मिली थी। वक्त के पहले मुझे सब कुछ मिलता गया और सैलरी भी अच्छी थी। जिसके बाद मैंने अपनी सेविंग्स बचा कर रखी, फिर मैंने सोचा की अब मैं चांस ले सकता हूं। जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में आने वाला था, उस वक्त मेरे मोहल्ले के लोग ज्ञान देने लगे थे। जिस बैंक में लोन लेने गया वहां का मैनेजर मुझे ज्ञान देने लगा था। सबसे बड़ी बात यह है की लोग मुझे इसलिए भी डिमोटिवेट करते थे, क्योंकि मेरी इस इंडस्ट्री में किसी से कोई जान पहचान नहीं थी। मैंने पहले फिल्म मेकिंग का कोर्स किया था, दूसरा मेरे स्वभाव के कारण मुझे ज्यादा स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। तो जो मेरा पहला काम था वो संजय लीला भंसाली जी के यहां पर था। उनकी बहन ने मुझे उनके पास भेजा था। क्योंकि जो मेरी टीचर थी वो और भंसाली सर की बहन दोस्त थीं। उसके बाद मुझे कभी किसी की मदत की जरुरत नहीं पड़ी और फिर मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।


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