4 माह में 113 ने की आत्महत्या 71% 40 साल से कम उम्र के, अवसाद के कारण घटनाएं बढ़ रहीं है
कन्हैया लाल, कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन...। संक्रमण रुका या नहीं, इस बहस को छोड़ भी दें, तो इस दौरान आम नागरिकों को विपरीत परिस्थितियां झेलने को मजबूर होना पड़ा। लोग घरों में रहने को मजबूर हो गए। काम-धंधे बंद हो गए।
बड़ी संख्या में शहर और राज्य से बाहर काम करनेवालों को गांव-घर लौटाना पड़ा। कई लोगों ने नए सिरे से रोजगार शुरू किया। लेकिन साथ ही कई लोग परिस्थितियों को नहीं झेल सके और अवसाद का शिकार होकर उन्होंने आत्महत्या कर ली।
धनबाद में लॉकडाउन के दौरान 4 माह में अप्रैल से लेकर अब तक (31 जुलाई) तक 118 दिनों में कुल 113 लोगों ने अपनी जान दे दी। इनमें सबसे बड़ी संख्या युवाओं की है- 51.5%। ये वे लोग थे, जिनके काम-धंधे चौपट हो गए, रोजगार के साधन छिन गए या जो जीवन में आगे कुछ बेहतर होने की उम्मीद खो बैठे।
जीवन की डोर छोड़ देनेवालों में 22 फीसदी किशोर वय के लड़के-लड़कियां भी थे। इनके पास जीने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी थी, लेकिन उन्होंने उसे किसी-न-किसी वजह से उत्तेजना में आकर खत्म कर दिया। इन दोनों उम्र वर्गों को मिला दें, तो लॉकडाउन के दौरान खुदकुशी करनेवालों में 70.7% किशोर या युवा हैं। खुदकुशी करनेवाले बाकी 29.1 फीसदी लोग अधेड़ या बुजुर्ग थे।
49% ने आर्थिक कारणों, 19% ने पारिवारिक कलह में जान दी
लॉकडाउन के दौरान रोजगार के साधन छिन जाना और आर्थिक तंगी ही आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह के रूप में सामने आई। करीब 49% लोगों ने इन्हीं वजहों से जान दे दी। इनमें ज्यादातर युवा या अधेड़ वर्ग के लोग शामिल हैं। वहीं, 19% लोगों ने पारिवारिक कलह या अन्य वजहों से जान दे दी। 10.3% ने प्रेम-प्रसंग, परीक्षा में असफलता या परिजनों की डांट-फटकार के बाद खुदकुशी कर ली। 19 फीसदी आत्महत्याओं की वजह अस्पषट है।
खुदकुशी करनेवालों में पुरुष ज्यादा
एक और खास बात, आम तौर पर आत्महत्या करनेवालों में ज्यादा संख्या महिलाओं की होती है। लेकिन, लॉकडाउन के दौरान पुरुषों ने ज्यादा आत्महत्या की। 118 दिनों में 31 महिलाओं के मुकाबले 82 पुरुषों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
कैसे थमे आत्महत्याओं का दौर...?
आंकड़े चिंताजनक हैं...आर्थिक, सामाजिक व मनोवैज्ञानिक तीनों पक्षों पर काम करना होगा
पिछले चार महीने में अकेले धनबाद में आत्महत्या के आंकड़े भयावह तस्वीर दिखाते हैं। वैसे तो आत्महत्या जैसा कदम लोग पहले भी उठाते आए हैं, लेकिन इन चार महीनों में घटित मामलों में कुछ ऐसे पक्ष हैं, जो लीक से अलग हैं। कुल 82 पुरुष और उसमें 71 फीसदी 40 वर्ष से कम के। अधिकतर लाॅकडाउन के आर्थिक कुप्रभाव से जुड़े। नौकरी का छूटना, रोजगार धंधे का बैठना, काम न मिलना आदि।
और यह प्रभाव निम्न सामाजिक आर्थिक वर्ग पर ज्यादा था और अधिकतर लोग परिवार चलाने वाले थे। जैसे-जैसे समय बढ़ा लोगों की उम्मीद टूटने लगी। आत्महत्या करने वाले अधिकतर लोग परिवार को चलाने वाले थे। यह समाज के लिए चिंता और चेतावनी दोनों ही है, क्योंकि इसका असर समाज पर किसी न किसी रूप में होगा। निदान क्या है और यह कैसे हो, यह विचारणीय है।
इसके तीन मुख्य पक्ष हैं- आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक। सबसे पहले मनोवैज्ञानिक पक्ष पर सोचना होगा, क्योंकि यही मनुष्य में उस पल के लिए जिम्मेदार है, जिसमें वह अंतिम निर्णय लेता है। यदि इसे टाल दिया जाए, तो कई जानें बच सकती हैं। हेल्पलाइन एक रास्ता है।
किंतु हेल्पलाइन को एक स्वीकार्य विकल्प बनाने के लिए अभियान चलाना होगा। अधिकतर मामले नियोजित नहीं होते और उन्हें रोका जा सकता है। सामाजिक पक्ष पर यह सोचना होगा कि आबादी तो बहुत बढ़ गई, लेकिन लोग खुद में सिमट गए और मनुष्य की सामाजिक प्राणी की परिभाषा बदल गई। आर्थिक पक्ष का तो कुछ संस्थागत विकल्प ढूंढना होगा।
from Dainik Bhaskar

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