अयाज मेमन की कलम से:जाफर के साथ जो हुआ, उसे चेतावनी समझें; BCCI को पूरे मामले की जांच करनी चाहिए, ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके: मुंबई
पिछले हफ्ते उत्तराखंड क्रिकेट और उसके कोच व मेंटर वसीम जाफर के बीच जो भी हुआ, वो भारतीय क्रिकेट और समाज के लिए चेतावनी की तरह है। एसोसिएशन के कुछ अधिकारियों ने जाफर पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगाए। आरोप था कि जाफर ने मुश्ताक अली ट्रॉफी के लिए धार्मिक आधार पर टीम चयन की कोशिश की थी। इससे वो लोग भी चौंक गए होंगे, जो जाफर को थोड़ा-बहुत भी जानते हैं।
उन पर लगे आराेप उनके चरित्र के बिल्कुल उलट
वास्तव में आरोप जाफर के चरित्र के बिल्कुल उलट हैं। जाफर के दो दशक के करिअर में उनके खिलाफ कभी कोई आरोप नहीं लगे। उन्होंने भारत के लिए 31 टेस्ट खेले। वे रणजी के हाईएस्ट रन स्कोरर हैं। उनका बतौर बल्लेबाज और कप्तान शानदार प्रदर्शन रहा है। उनका मजबूत वर्क एथिक्स है। वे कोच और मेंटर के रूप में काफी परिपक्व हैं। इसलिए उन्हें अपने साथियों के अलावा विरोधी टीम के खिलाड़ियों का भी समर्थन हमेशा मिला है।
उत्तराखंड क्रिकेट में पिछले तीन सीजन में तीन कोच नियुक्त
पूर्व कप्तान अनिल कुंबले ने सोशल मीडिया पर उनका समर्थन किया। इसके अलावा इरफान पठान, मनोज तिवारी, अमोल मजूमदार और मोहम्मद कैफ आदि से भी उन्हें समर्थन मिला। यह भी खुलासा हुआ कि उत्तराखंड क्रिकेट में पिछले तीन सीजन में तीन कोच रहे हैं, जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। इससे कुछ नहीं तो राज्य एसोसिएशन के भीतर की राजनीति दिख रही है।
BCCI को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच करनी चाहिए
आरोप लगने के बाद जाफर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ लगाए आरोपों पर स्थिति स्पष्ट की। राज्य संघ की ओर से अभी तक इस मामले में कोई रिस्पॉन्स नहीं आया है। इस विवाद और जाफर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद संघ के सचिव ने मामले से पल्ला झाड़ लिया। सिर्फ मैनेजर को शिकायतकर्ता के रूप में छोड़ दिया। बीसीसीआई को मामले की तह तक जाने के लिए जांच करवानी चाहिए। जो भी दोषी हो, उसके खिलाफ कड़ी से कार्रवाई करनी चाहिए।
सांप्रदायिकता भयावह मुद्दा
सांप्रदायिकता एक भयावह मुद्दा है। मुझे चार दशक से ज्यादा हो गया, खेल का कवरेज करते हुए। लेकिन मैंने इस तरह की बात पहली बार सुनी है। अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों ने न सिर्फ ड्रेसिंग रूम शेयर किया है बल्कि होटल रूम में भी साथ रहे हैं। उस दौरान उन्होंने बिना किसी परेशानी के अपनी आस्था का पालन किया है। ऐसा सिर्फ क्रिकेट में नहीं बल्कि दूसरे खेलों में भी है।
उत्तराखंड में जो भी हुआ वह चिंताजनक
उत्तराखंड क्रिकेट में जो भी हुआ, वह चिंताजनक है। उम्मीद है कि यह एक संकेत नहीं है कि हमारी राजनीति की विषाक्तता खेल में भी अपना जाल फैला रही है।


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