डॉ. पेयो के नाम से मशहूर घोड़ा:कैंसर से जूझ रहे मरीजों का दर्द दूर करता है घोड़ा, पैरों से इशारा कर बताता है कि उसे किस मरीज से मिलना है: पेरिस - AKB NEWS

डॉ. पेयो के नाम से मशहूर घोड़ा:कैंसर से जूझ रहे मरीजों का दर्द दूर करता है घोड़ा, पैरों से इशारा कर बताता है कि उसे किस मरीज से मिलना है: पेरिस


 फ्रांस के कैलिस अस्पताल में कैंसर से जूझ रहे मरीजों को ‘डॉ. पेयो’ रोज राहत पहुंचाने आते हैं। डॉ. पेयो कोई और नहीं बल्कि उस घोड़े का नाम है, जिसे हसन बूचकोर ने खास तौर पर मरीजों की सेवा के लिए प्रशिक्षित किया है।

मरीजों के असहनीय दर्द को कम करने के कारण पेयो ‘डॉक्टर’ के तौर पर मशहूर हो गया है। पेयाे 15 साल का है। वह पैरों से इशारा कर बताता है कि उसे किस मरीज के रूम में जाना है। उनके साथ कितनी देर तक रहना है। हसन के मुताबिक पेयो को पता चल जाता है कि मरीज को कैंसर है या ट्यूमर।’

पेयाे इस तरह से इशारा कर बताता है कि उसे किस मरीज के रूम में जाना है। उनके साथ कितनी देर तक रहना है। पेयो को पता चल जाता है कि मरीज को कैंसर है या ट्यूमर।’
पेयाे इस तरह से इशारा कर बताता है कि उसे किस मरीज के रूम में जाना है। उनके साथ कितनी देर तक रहना है। पेयो को पता चल जाता है कि मरीज को कैंसर है या ट्यूमर।’

मैटास्टैटिक कैंसर से पीड़ित 24 साल की मारिन से जब उनका बच्चा मिलने के लिए आया तो पेयो को साथ लेकर पहुंचा। दर्द से छटपटा रही मारिन कहती हैं, ‘पेयो और बच्चे को देखकर मेरा दर्द खत्म हो गया। वहीं इसी अस्पताल में 67 साल के डेनियल ने जनवरी में दम तोड़ा।

पेयो उनका जिगरी दोस्त बन गया था। टर्मिनल कैंसर से पीड़ित डेनियल की ख्वाहिश थी कि उनके अंतिम संस्कार में पेयो भी शामिल हो। उनके निधन के बाद जब शव अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था, तब पेयो की आंखें भी हुई थीं। पेयो उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुआ। ऐसी और भी कहानियां हैं।

टर्मिनल कैंसर से पीड़ित डेनियल की ख्वाहिश थी कि उनके अंतिम संस्कार में पेयो भी शामिल हो। पेयो उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुआ।
टर्मिनल कैंसर से पीड़ित डेनियल की ख्वाहिश थी कि उनके अंतिम संस्कार में पेयो भी शामिल हो। पेयो उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुआ।

अस्पताल में मरीजों के साथ कुछ वक्त बिताता है
हसन बताते हैं, ‘हम दोनों अपना ज्यादातर समय मरीजों के साथ अस्पताल में बिताते हैं। अस्पताल प्रशासन की अनुमति से हम मरीजों तक जाते हैं। उनके साथ वक्त बिताते हैं। मरीज पेयो को दुलार करते हैं। पेयो भी उन्हें उतने ही स्नेह से प्रतिक्रिया देता है। इस तरह उन लोगों की तकलीफ को कुछ दूर के लिए ही सही, कम कर पाते हैं।’


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