इसलिए छात्राओं ने बदला ब्रांच:यूजी माइंस में रात में महिलाओं को काम करने की आजादी अब भी नहीं : धनबाद
साल 2016...। आईआईटी आईएसएम में माइनिंग इंजीनियरिंग में लड़कियों के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा। इस प्रतिबंध के हटने के बाद साल 2017 में संस्थान के इतिहास में पहली बार तीन लड़कियों ने माइनिंग में एडमिशन लिया।
तीन माह बाद तीनों लड़कियों को इंजीनियरिंग की डिग्री मिल जाएगी, पर अफसोस... यह डिग्री माइनिंग इंजीनियरिंग की नहीं होगी। दरअसल, माइनिंग इंजीनियर बनने का सपना लेकर आईआईटी धनबाद आई शाची सिंह, स्निग्धा और श्वेता ने बीच में ही माइनिंग की पढ़ाई छोड़ दी और अपना ब्रांच बदल लिया। श्वेता पेट्रोलियम इंजीनियरिंग में जा चुकी हैं, वहीं शाची व स्निग्धा माइनिंग को छोड़ इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रही हैं।
माइनिंग छोड़ने का कारण तीनों का एक ही है। तीनों कहती हैं कि नियमाें में संशाेधन के बावजूद अब भी कुछ प्रतिबंध रह गए हैं, जाे महिलाओं काे पुरुषाें के समान खड़ा हाेने से राेकते हैं। ओपेन कास्ट में उन्हें काम करने का अधिकार मिला, पर अंडरग्राउंड माइंस में शाम 7 से सुबह 6 बजे तक काम करने की अनुमति नहीं मिली।
रात में यहां आज भी महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है। ऐसे में उन्हें अपना भविष्य नहीं दिखा। तीनों छात्राओं ने बताया कि कोई कंपनी महिला इंजीनियर को नौकरी क्यों देगी, जब उन्हें पता है कि रात में उनसे काम नहीं लिया जा सकता। काम में समानता नहीं मिलने से उन्होंने माइनिंग की पढ़ाई ही छोड़ दी।
माइनिंग चाहती थी, पर परेशानी बहुत थी: स्निग्धा
रांची की स्निग्धा ने बताया कि माइनिंग इंजीनियरिंग के लिए मुझे घर से ही प्रेरणा मिली थी। मामा व चाचा कोयला क्षेत्र में रहे हैं। खुद माइनिंग में कैरियर बनाना चाहती थी, पर इस क्षेत्र में परेशानी दिखी। जब इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का विकल्प मिला ताे उसे चुन लिया।
आज भी ऐसे प्रतिबंध, जिससे पीछे रह जाती : श्वेता
दरभंगा की श्वेता ने बताया कि रात के वक्त लड़कियां अभी भी माइंस में नहीं जा सकती हैं। ऐसे में काेई भी कंपनी आती है ताे वह ऐसे प्रतिबंधाें काे लेकर साेचेगी। लड़कियाें से बेहतर लड़के हाेंगे, जाे रात में भी माइंस में आ-जा सकेंगे। संभव है कि हमें उतने अवसर नहीं मिलते। पीछे रह जाते।
सिर्फ ओपेनकास्ट में जाने की अनुमति, कैसे करती नौकरी: शाची
यूपी की शाची सिंह ने बताया कि जब माइनिंग के क्षेत्र में जाने का मौका मिला तो उन्होंने दाखिला ले लिया। पर यहां नियम बाधक बन गया। लड़कियों को अंडरग्राउंड में आज भी उन्हें जाने की आजादी नहीं है। इस स्थिति में भविष्य सुरक्षित नहीं दिखा। मौका मिला तो ब्रांच बदल लिया।


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