अब ब्लैक फंगस भी : पुरे 3095 मरीजे आये कोरोना ओपीडी में जांच और उनमे से 22 % को डायबिटीज, 17% को बीपी और 13.8% को हार्ट की प्रॉब्लम
काेराेना निगेटिव हाेने के बाद अब लाेगाें में गंभीर बीमारियों के लक्षण दिखने लगे हैं। काेराेना के नए स्ट्रेन और स्टेराॅयड के अंधाधुंध इस्तेमाल के कारण लाेग डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, हार्ट, किडनी, मानसिक अवसाद और कमजाेरी जैसी समस्याओं से घिरने लगे हैं। इनकी संख्या ब्लैक फंगस के मरीजों से कहीं ज्यादा है। काेराेना से सर्वाधिक प्रभावित पांच जिलाें रांची, जमशेदपुर, हजारीबाग, बाेकाराे और धनबाद में एक से 15 जून के बीच पाेस्ट काेविड ओपीडी में 3095 मरीज अाए। इनमें से 22 प्रतिशत डायबिटीज, 17 प्रतिशत ब्लड प्रेशर, 13.8 प्रतिशत हार्ट, 9.3 प्रतिशत किडनी और 17 प्रतिशत लाेग मानसिक अवसाद से ग्रसित मिले।
फेफड़े और काेराेनरी आर्टरी में खून का थक्का जमने से पिछले 20 दिनाें रिम्स में 15 लाेगाें की माैत भी हुई। 29 लाेग ब्लैक फंगस के शिकार भी हुए। इनमें से एक की माैत हाे गई। विशेषज्ञाें का कहना है कि काेराेना के कुछ वेरिएंट ने सीधे मरीज के रेस्पिरेटरी सिस्टम और पैन्क्रियाज काे नुकसान पहुंचाया है। नया वेरिएंट संक्रमण बढ़ाने वाले प्राेटीन के जरिए सीधे पैन्क्रियाज तक पहुंचकर बीटा सेल नष्ट करके इंसुलिन बनाने की प्रक्रिया काे बाधित कर रहे हैं। यानी उनकी राेग प्रतिराेधक क्षमता घटा रहे हैं। यही वजह है कि लाेग तेजी से डायबिटीज के शिकार हाे रहे हैं। डाॅक्टराें का कहना है कि जब भी काेई लक्षण दिखे ताे तत्काल डाॅक्टर से संपर्क करना चाहिए।
खून जमना कार्डियक अरेस्ट की बड़ी वजह
रांची सदर अस्पताल के पाेस्ट काेविड ओपीडी इंचार्ज डाॅ. अजित कुमार ने बताया कि पाेस्ट काेविड ओपीडी आने वाले मरीजाें की खून से संबंधित जांच कराई गई। इनमें करीब 75 प्रतिशत राेगियाें का खून गाढ़ा मिला। यही कार्डियक अरेस्ट का कारण बनता है। काेविड में भी ज्यादातर माैताें का यही कारण रहा।
14 साल तक के बच्चों में मल्टी इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम, बड़ाें में ब्लैक फंगस
रिम्स के डॉ. प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि उम्र के हिसाब से भी लोगों में पोस्ट कोविड बीमारी हाे रही है। मसलन बड़ोें में जहां ब्लैक फंगस हाे रहा है तो 2 से 14 साल तक के बच्चों में मल्टी इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम (एमआईएस-सी) देखने को मिल रहा है। कुछ केस में आंतों में भी संक्रमण भी मिला है। बड़ों में थ्रॉम्बोसिस (नस में थक्का जमना) व रेस्पिरेटरी क्रिपल के मामले भी ज्यादा देखे जा रहें है। दरअसल कोविड के दौरान मरीजों में ऑक्सीजन की कमी से मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है, ऐसे में मरीज काे हाईपोक्सिक ब्रेन इंजरी का भी खतरा बना रहता है।
रिम्स के मरीजों में थ्रॉम्बोसिस की समस्या ज्यादा
* थ्रॉम्बोसिस- बाकी जगहों की तुलना में रिम्स में भर्ती मरीजों में 30% में इसके लक्षण दिख रहे हैं। खून की जांच कराने पर थक्का देखा जा रहा है। खून पतला होने की दवाई के बाद 2 सप्ताह रिव्यू के बाद भी ठीक नहीं होने पर भर्ती करने की सलाह दी जा रही है। देर करने पर हार्ट अटैक की समस्या हो सकती है।
* डायबिटीज- मधुमेह का लक्षण भी काफी रोगियों में है। वैसे मरीज जिनकी कोविड के दौरान स्थिति गंभीर थी, एस्टेराॅयड का अधिक इस्तेमाल हुआ है। इसके कारण डायबिटीज के मामले बढ़े है।
* सांस संबंधी बीमारी- सांस की समस्या पोस्ट कोविड ओपीडी में पहुंचने वाले 70 से 75% मरीजों में देखा जा रहा है। घर में काम के दौरान थकान, थाेड़ा चलने में हांफने लगना, इन शिकायतों के साथ मरीज पहुंच रहे है और जांच में लंग्स इंफेक्शन दिख रहा है। ऐसे मरीजों को भर्ती होने की सलाह दी जा रही है।
* मानसिक अवसाद- इनकी संख्या 17% के करीब है। ज्यादातर रोगी डिप्रेशन, फिजूल सोच, सेक्सुअल समस्या को लेकर पहुंच रहें है। इस स्थिति में काउंसिलिंग जरूरी है।


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