अजब जज्बे की गजब कहानियां, इंटर पास युवक ने नदी के पानी से बिजली बनाई, गांव को मुफ्त
झारखंड अनूठे प्रयोगों, उद्यमशीलता और मेहनत से तेजी से बदल रहा है। कल तक जहां लोग सरकार से अपेक्षा रखते थे, वहीं आज खुद आगे बढ़कर इनोवेशन से नए मॉडल खड़े कर रहे हैं। बदलाव गांवों में शुरू हो गए हैं। लोग ऐसे मॉडल गढ़ रहे हैं जिनकी बदौलत वो कोरोनाकाल में भी डटे रहे। खुद के साथ दूसरों का भी सहारा बने। ये देश-दुनिया के लिए प्रेरक हैं। पेश है ऐसी ही 5 कहानियां...
इंटर पास युवक ने नदी के पानी से बिजली बनाई, पूरे गांव को दे रहा अब मुफ्त सेवा
‘स्वदेश’ सी कहानी: 150 की आबादी वाला खड़िया ठकुराइन डेरा गांव 24 घंटे रोशन

(प्रसन्नजीत घोष) लोहरदगा: ‘स्वदेश’ फिल्म में नासा से आए शाहरूख खान ने जैसे एक गांव में जुगाड़ टेक्नोलॉजी से बिजली पैदा की, वैसे ही जज्बे की कहानी लोहरदगा में किस्को के खड़िया ठकुराइन डेरा गांव के कमिल टोपनो की है। जिनकी मेधा ने गांव में रोशनी बिखेर दी। इंटर पास कमिल ने आयरा झरिया नदी में पानी के प्रेशर से मोटर टरबाइन चलाकर बिजली बना दी।
150 की आबादी वाला गांव 24 घंटे रोशन है। मुफ्त बिजली मिल रही है। इस मॉडल से इस प्रदेश में इस प्रकार बिजली पैदा की जा सकती है। कमिल ने यह कमाल इंटर की किताब व साइंस मैग्जीन से किया। आयरा झरिया नदी से करीब डेढ़ किमी दूर एक 100 फीट गहरा गड्ढा बनाया, जिसमें टरबाइन, मोटर लगाया। टरबाइन घूमने से मोटर बिजली पैदा करने लगा। तार के जरिए घर में बिजली पहुंचाई गई।
खास बात: गांववालों को मुफ्त 5 केवी बिजली मिल रही
कमिल ने बताया कि गांव में बिजली नहीं थी। 2014 में पुराना टरबाइन खरीदा। इस अवधि में दो बार असफलता झेलनी पड़ी और 10 हजार का नुकसान हुआ। 2019 में 5 केवी बिजली पैदा होने लगी, जिस पर मात्र 12 हजार खर्च हुए। पूरे प्रोजेक्ट की रखवाली गांव के युवा करते हैं।
हर घर की महिलाओं ने मिलकर बनाया ट्रस्ट, इनके हैंडलूम कपड़े की देश में मांग
को-ऑपरेटिव की मिसाल: हजारीबाग का कजरी गांव हैंडलूम से हुआ आत्मनिर्भर

(रणदीप दुबे) चरही : रंग महिलाओं काे बेहद पसंद होते हैं। बात स्वदेशी रंग की है। जिससे सराबोर होकर हजारीबाग जिले के चुरचू प्रखंड की महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी है। नक्सल प्रभावित गांव कजरी में आदिवासी महिलाएं हैंडलूम प्रोडक्ट्स तैयार कर दिल्ली, शिमला, नगालैंड, भोपाल, मुंबई, हैदराबाद में सप्लाई कर रही हैं।
2011 में गांव के विंसेंट टुडू, अमर और सहदेव किस्कू ने 20 महिलाओं का हिहड़ी पिपड़ी आदिवासी ट्रस्ट बनाया। गांव के सभी 320 घरों की महिलाएं देसी परिधान ट्राइफेड के माध्यम से बेचती हैं। वे हर महीने 5 हजार तक कमा लेती हैं। अब उन्हें आर्थिक परेशानी से गुजरना नहीं पड़ता। इनकी सफलता देखकर अब बगल के बोदरा गांव में भी हैंडलूम की 12 मशीनें लगाई गई हैं।
खास बात: दीक्षांत समारोह में खादी के अंगवस्त्र बनाए
2019 में विनोबा भावे विवि के दीक्षांत समारोह में खादी के 6500 अंगवस्त्र यहां की महिलाओं ने बनाए। कजरी की मरियम मुर्मू, आहिला टुडू, शांति देवी, मीनू किस्कू ने बताया कि हमलोग स्वदेशी को बढ़ावा दे रहे हैं। गांव में ही रोजगार मिलने से हमारी सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं।
पानी लाने पत्नी डेढ़ किमी जाती थी, पहाड़ का सीना चीरकर पत्थरों से निकाला पानी
झारखंड के दशरथ माझी: छह माह में खोदा 25 फीट कुआं, घर तक पहुंचाया पानी
(रंजीत प्रसाद) खूंटी: संकल्प अटल हो तो चट्टान भी पिघल सकता है। सुनने में आश्चर्यजनक लगे, लेकिन खूंटी के कोजड़ोंग गांव निवासी चाड़ा पाहन ने इसे हकीकत कर दिखाया है। उनकी कहानी भी माउंटेनमैन दशरथ माझी से मिलती-जुलती है। पेयजल के संकट से जूझ रहे कोजड़ोंग गांव में बीमार पत्नी एमोन पाहन को दूर पहाड़ी के पास जाकर पानी लाना पड़ता था।
उनकी परेशानी देख चाड़ा ने 250 फीट ऊंचे पहाड़ पर पत्थरों का सीना चीर 25 फीट गहरा कुआं बना डाला और पाइप के जरिए घर तक पानी पहुंचा दिया। अब घर के पास नल लगा दिया है, जहां गांव के लोगों को बगैर बिजली और मोटर के 24 घंटे लगातार पानी मिल रहा है। घर से पहाड़ की दूरी करीब 500 मीटर है। चाड़ा को इस कुएं को खोदने में छह महीने लगे।
खास बात: एक आइडिया से बदली जिंदगी, दूर हुई परेशानी
चाड़ा ने बताया कि पत्नी बीमार थी, लेकिन उन्हें घर से डेढ़ किमी दूर पानी लाने जाना पड़ता था। लकड़ी लाने के लिए पहाड़ पर गए तो पानी का रिसाव दिखा, अचानक उनकोे आइडिया आया कि पहाड़ पर कुआं बना दें तो पानी जमा होगा। फिर 6 महीने में 25 फीट गहरा कुआं खोद दिया।
ग्रामीणों का अपना अस्पताल, 24 घंटे रहते हैं डॉक्टर, इलाज को कोई नहीं जाता बाहर
पहल:100% साक्षर चतरा के हड़ियो गांव के अस्पताल में इलाज की हैं सारी सुविधाएं

(जितेंद्र तिवारी/विष्णु कुमार), पत्थलगडा: दर्द जब हद से गुजर जाए तो उसका समाधान इंसान निकाल ही लेता है। सिर्फ आत्मविश्वास की जरूरत पड़ती है। चतरा-हजारीबाग जिले की सीमा पर स्थित आदिवासी बहुल हड़ियो गांव के लोगों ने इसे सिद्ध कर दिया। बीमार पड़ने पर इलाज कराने बाहर नहीं जाते, खुद ही अपना अस्पताल खोल लिया। यहां 24 घंटे डॉक्टर व नर्स तैनात।
सारी व्यवस्था आपसी चंदा व संस्थाओं की मदद से होती है। सभी का वेतन दिया जाता है। एंबुलेंस भी है। मुखिया जूलियाना टोप्पो के अनुसार गांव की 500 आबादी 100% साक्षर हैं। यहां के लोग सिर्फ टीकाकरण और जन्म प्रमाण पत्र बनाने ही सरकारी अस्पताल जाते हैं। बाहर नर्स रही गांव की बेटियां सेवा देने घर लौट आई हैं। उन्होंने ही डॉक्टर-स्टाफ का इंतजाम किया।
खास बात: अब दूसरे गांव के लोग भी आते हैं इलाज कराने
समाजसेवी इलियास टोप्पो ने बताया कि पहले बीमारी के लिए ग्रामीणों को चतरा-हजारीबाग जाना पड़ता था। 2010 में गांव में अस्पताल खोलने का निर्णय लिया गया। आपस में चंदा कर भवन बनवाया गया। 2014 में अस्पताल शुरू हुआ, अब दूसरे गांव के लोग भी इलाज के लिए आते हैं।

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