बकरीद बाजार बेरौनक, बकरों की कीमत में 20% गिरावट... सावधानी के बावजूद ग्राहक कम
त्याग और समर्पण का पर्व ईद उल अजहा यानी बकरीद को महज 5 दिन है। लेकिन, बाजार और मोहल्लों में वो रौनक नहीं है, जो हुआ करती थी। कोरोना वायरस के खौफ से न हर चौक-चौराहों पर जानवरों का मेला है न प्रमुख बाजार ही बकरों से अटे हैं। पहले की अपेक्षा डॉ. फतह उल्लाह मस्जिद के पास बकरे बिक्री के लिए लेकर जरूर पहुंच रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।
हालांकि, पूरी सावधानी बरती जा रही है। बकरे को थोड़ी-थोड़ी देर में सेनिटाइज किया जा रहा है। कई बकरे मास्क के साथ भी दिखे। बरियातू से आए एक खरीदार आसिफ छोटू ने बताया कि कोरोना वायरस ने कारोबारियों और लोगों पर काफी असर डाला है।
पिछले साल तक 2 और 3 बकरे खरीदते थे, इस बार एक बकरा भी नहीं खरीद पा रहे हैं। कांके से पहुंचे विक्रेता रिजवान अंसारी बोले कि पहले कोरोना की वजह से बकरों की कीमत में 10 से 20 फीसदी की गिरावट हुई है। बाजार में 20 हजार से सवा लाख रुपए तक का बकरा उपलब्ध है। एमजी रोड के एक दुकानदार अर्सलान अकरम ने बताया कि वो हर साल एक बकरा खरीदते हैं।
इस साल उनकी दुकान लगभग पूरे समय बंद रही। इसलिए, उन्हें एक बकरा भी खरीदने में सोचना पड़ रहा है। आजाद बस्ती के जहीर ने बताया कि एक बकरे की परवरिश में 18 से 24 महीना लगता है। उसकी देखरेख और खान-पान पर बहुत खर्च होता है। गेहूं, चना, मक्का, जौ और घास आदि के अलावा दूध भी उसकी खुराक में शामिल है। लेकिन, जिस तरह बाजार फीका है, अगर सही कारोबार नहीं हो सका तो बहुत मुश्किल होगी।
कुरबानी जरूर करें, लेकिन ध्यान रहे किसी का भी दिल न टूटे
ईद-उल-अज्हा में अल्लाह की खुशनूदी और गरीबों की मदद की खातिर कुर्बानी करना इबादत कही जाती है। चूंकि, अभी कोरोना के सबब सोशल डिस्टेंसिंग समेत कई तरह की एहतियात बरती जा रही है। इसलिए, शहर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं अंजुमन इस्लामिया के महासचिव हाजी मुख्तार अहमद, उपाध्यक्ष मंजर इमाम, मरहबा ह्यूमन सोसायटी के महासचिव निहाल अहमद, अमन यूथ सोसायटी के महासचिव राशिद अख्तर, जनता हेल्प लाइन के अध्यक्ष एजाज गद्दी और युवा झारखंड के अध्यक्ष अरशद कुरैशी ने सोशल डिस्टेंसिंग और सफाई का हर हाल में पालन करने का लोगों से आग्रह किया है।
कहा है कि हमें बकरीद आपसी भाईचारा और सद्भाव के साथ मनाना चाहिए। हमारी किसी भी अमल से किसी को तकलीफ न पहुंचे, किसी का दिल न टूटे, यह खास ख्याल रखना है। किसी को कष्ट नहीं पहुंचे, ध्यान रखें। गरीबों और वंचितों का खास ख्याल रखना है। पूरी जिम्मेदारी के साथ इसे निभाना है। इस्लाम में पाकी और सफाई को ईमान का हिस्सा कहा गया है। नबी अकरम (सल्ल.) ने रास्ते से तकलीफदेह चीजों को हटाने को कहा है। इसपर अमल करना भी ईमान है।
from Dainik Bhaskar

Leave Comments
एक टिप्पणी भेजें