लावारिस नवजातों को नई जिंदगी दे रहीं मोनिका, 5 सालों में 105 को बचाया
सैयद शहरोज़ कमर, मां! तुमने 9 माह तक बिस्तर के कितने दर्दीली सिलवटों संग गुजारे। कितनी कंटीली राहें मेरी खातिर तय कीं। तूने वाे तमाम चीजें खाना छाेड़ दिया जाे मुझे नुकसान पहुंचाती। मुझे जन्म देते समय तेरी काया तक निचुड़ गई, लेकिन तूने मुझे अपने सीने से लगाने और ममता की गाेद देने के बजाय झाड़ी और नाले जैसी जगह पर मरने के लिए क्यों छोड़ दिया। आखिर मेरी क्या गलती थी! क्या मुझे खुद से दूर करते तेरा रूह नहीं कांपा। तुझे दर्द नहीं हुआ।
ये भावुक उद्गार उन तमाम नवजातों के हैं, जिन्हें लावारिस मरने को छोड़ दिया जाता है। झारखंड इस मामले में 17 वें नंबर पर है। लेकिन ऐसे लावारिस नवजातों को जिंदगी देने के सार्थक प्रयास में जुटी हैं मोनिका गुंजन। वह शहर के युवाओं की टोली पा-लो-ना नामक संस्था के जरिए इन बच्चों को ममताई गोद देने के प्रयास में लगी हैं। 2015 से अब तक इन्हें 237 लावारिस नवजात मिले। हालांकि इनमें से 132 दम तोड़ चुके थे लेकिन टीम 105 बच्चों को नई जिंदगी देने में सफल रही। ये बच्चे अभी करुणा आश्रम, सहयोग विलेज आदि बालाश्रयों में परवरिश पा रहे हैं।
बालाश्रय बने सहारा... करुणा आश्रम और सहयोग विलेज में गूंज रही बच्चों की किलकारियां
ये हैं आंकड़े
237 लावारिस नवजात अब तक मिले संस्था को
132 नवजात बच्चे दम तोड़ चुके थे
2015 से बच्चों के लिए काम रहीं मोनिका
ऐसे शुरू हुआ कारवां...
मोनिका बताती हैं कि 2015 की जनवरी में रांची रेलवे स्टेशन के पास कूड़े में पड़े एक नवजात की सूचना मिली, जिसे कुत्ते नोच रहे थे। यह सुनते ही अंदर तक हिल गई। तुरंत वहां पहुंची लेकिन उसे बचाया न जा सका। जुलाई में कोकर से ऐसी सूचना मिली। ममत्व जागा शब्द निकले पा-लो-ना! बस इसी नाम से फेसबुक पेज बना लोगों को जागरूक करने लगी।
शिविर-सेमिनार से संदेश... बच्चे को फेंकें नहीं, पाल नहीं सकते तो अनाथाश्रम को दे दें
संस्था के सदस्य लगातार शिविर, सेमिनार आदि का आयोजन कर लोगों को जागरूक करते हैं कि नवजातों को फेंकें नहीं। अगर आप उसे नहीं पाल सकते हैं तो उन्हें अनाथाश्रम को दे दें। बच्चे का यूं ही फेंक देना कितना बड़ा अपराध है और उसकी सजा क्या है, इस बारे में जानकारी देते हैं।
ऐसे काम करती है टीम... लावारिस नवजात की सूचना आम लोग, मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं से टीम को मिलती है। टीम तुरंत पुलिस व बाल संरक्षण आयोग को इसकी जानकारी देती है। ऐसे बच्चों को पहले अस्पताल फिर आश्रयगृहों को सौंप दिया जाता है।
from Dainik Bhaskar

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