रांची जिला भू-अर्जन कार्यालय से हुए करोड़ों के अवैध भुगतान की जांच के आदेश
जीतेंद्र कुमार, रांची के उपायुक्त छवि रंजन ने रांची जिला भू-अर्जन कार्यालय द्वारा भूमि-अधिग्रहण के विरुद्ध हुए करोड़ों के अवैध भुगतान की जांच के आदेश दिए हैं। पिछले वर्ष सितंबर में मामला प्रकाश में आने के बाद योजना सह वित्त विभाग ने अक्तूबर 2010 में उपायुक्त को जांच कराने का निर्देश दिया थाए लेकिन जांच की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हुई थी। योजना सह वित्त विभाग ने 9 जुलाई 2020 को फिर अवैध भुगतान संबंधी मामलों की जांच कर प्रतिवेदन की मांग की है।
इसके बाद उपायुक्त ने छह अगस्त 2020 को अपर समाहर्ता भू-अर्जन आशिफ इकराम और कार्यपालक दंडाधिकारी श्वेता वेद को जांच कर अविलंब प्रतिवेदन जमा करने का आदेश दिया है। हालांकि दिलचस्प पहलू अभी यह भी है कि जिला भू-अर्जन कार्यालय के जिन पदाधिकारियों के विरुद्ध आरोप है, उनमें प्रधान लिपिक सचिन कुमार अभी भी उसी कार्यालय में पदस्थापित हैं।
ऐसे किया घोटाला... पत्नी व रिश्तेदारों के नाम रैयतों से जमीन खरीद ली
रांची जिला भू-अर्जन कार्यालय में बैठे कुछ अधिकारियों -कर्मियों पर आरोप है कि राज्य आवास बोर्ड परियोजना के तहत पिठौरिया के सांगा में भूमि अधिग्रहण के लिए भू-अर्जन की धारा-11 के तहत अधिसूचना जारी होते ही, इन लोगों ने अपनी पत्नी व रिश्तेदारों के नाम रैयतों से जमीन खरीद ली और बाद में सरकार से मुआवजे के रूप में अधिक राशि का भुगतान भी ले लिया।
भू-अर्जन कार्यालय की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह रजिस्ट्री ऑफिस को उन रैयतों का खाता-प्लॉट संख्या उपलब्ध कराए, ताकि निबंधन नहीं हो सके। लेकिन सचिन कुमार ने पत्नी के नाम पर और लिपिक अजीत कुमार ने अपने भाई के नाम पर जमीन खरीद ली। मुआवजे के रूप में 86 लाख रुपये का भुगतान भी ले लिया। इसका प्रमाण यह है कि धारा-11 के तहत भू-अर्जन की अधिसूचना 16 नवंबर 2016 को जारी हुई और जमीन की खरीद बिक्री 22 दिसंबर 2016 (डीड नंबर-8716) को हुई।
राज्य में जारी है यह खेल... पहले की जांच में भी आरोप सही पाया गया था
अपर समाहर्ता रांची द्वारा इस संबंध में 8 जनवरी 2019 को लोकायुक्त को सौंपी गई रिपोर्ट में भी गड़बड़ी की पुष्टि की गई है। जानकारों के अनुसार भू-अर्जन के नाम पर यह खेल पूरे राज्य में हो रहा है। जिस इलाके में राज्य सरकार द्वारा भू-अर्जन संबंधी अधिसूचना जारी होती है, उस इलाके में इस विभाग या कार्यालय से जुड़े अधिकारियों, नेताओं व अन्य लोगों द्वारा जमीन की खरीद कर ली जाती है।
बाद में राज्य सरकार से मुआवजे के रूप में सरकारी दर की लगभग चार गुणा राशि प्राप्त कर ली जाती है। इसमें करोड़ों का खेल जारी है। पूरे प्रकरण में रैयत मारा जाता है, जिसे यह समझा कर जमीन ले ली जाती है कि सरकार उनकी जमीन अधिग्रहित करने जा रही है। जिससे उन्हें सरकार से जमीन का सही मूल्य नहीं मिल पाएगा। वह औने-पौने दाम में उनकी जमीन ले लेगी।
from Dainik Bhaskar

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