महाशक्तियों के बीच नए समीकरण:अलास्का में बातचीत की टेबल पर बैठेंगे अमेरिका और चीन, अच्छे रिश्तों की शुरुआत पर 5 विवादों का साया : वॉशिंगटन
रिश्तों में कड़वाहट के बीच अमेरिका और चीन 18 मार्च को बातचीत की टेबल पर होंगे। यह मीटिंग अलास्का के एंकरेज में होगी। इसमें अमेरिका की ओर से विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जैक सुलीवान अपने उनके चीनी काउंटरपार्ट से बात करेंगे। बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन की चीन से यह पहली बातचीत है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध काफी बिगड़ गए थे। ऐसे में रिश्तों को दोबारा ट्रैक पर लाने में यह बैठक अहम साबित हो सकती है। हालांकि, मीटिंग से पहले अमेरिका ने सख्त रुख दिखाने के संकेत दिए हैं। उसने कहा है कि वह चीन से उइगरों पर अत्याचार, ताइवान, तिब्बत, हांगकांग में चीन के दखल और दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर स्थिति साफ करने के लिए कहेगा।
अमेरिका के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि इस बैठक से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इसमें कोई समझौता करने के बजाय प्राथमिकताओं और मतभेदों पर चर्चा पर ज्यादा जोर रहेगा। हमें लगता है कि बातचीत के कुछ हिस्से मुश्किल हो सकते हैं। वहीं, व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी जेन साकी ने मंगलवार को कहा कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर राष्ट्रपति जो बाइडेन आवाज उठाने से पीछे नहीं हट सकते। इनमें ह्यूमन राइट्स, इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी से जुड़े मसले शामिल हैं।
5 विवाद जो अमेरिका और चीन को दोस्त नहीं बनने देते...
1. हांगकांग में लोकतंत्र का दमन
हांगकांग में चीन लगातार अपना दखल बढ़ाता जा रहा है। हांगकांग में लोकतंत्र का समर्थन करने वाले इसका विरोध करते हैं। अमेरिका लोकतंत्र समर्थकों का खुला समर्थन करता है। इसका असर चीन के साथ उसके संबंधों पर भी पड़ा है। दोनों देशों के बीच होने वाली बैठक में इस मुद्दे पर भी बात हो सकती है। मीटिंग से पहले अमेरिका ने हॉन्गकॉन्ग और चीन के 24 अफसरों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। CNN के मुताबिक, ये प्रतिबंध को हांगकांग ऑटोनोमी एक्ट के तहत लाए गए थे।
यह एक्ट अमेरिका ने चीन के नए नेशनल सिक्योरिटी लॉ के जवाब में पिछले साल पास किया था। चीन ने कानूनी तौर पर विदेशी के साथ दखल पर रोक लगा दी थी। जिन लोगों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनमें वांग चेन का नाम भी शामिल हैं। वांग चीन के 25 सदस्यों वाले पोलित ब्यूरो का हिस्सा हैं। यह चीन की सबसे बड़ी कानून बनाने वाली संस्था है। इस कमेटी में ताम यियू-चुंग हांगकांग के इकलौते प्रतिनिधि हैं। ताम ने ही नेशनल सिक्योरिटी लॉ का मसौदा तैयार किया था।
अमेरिका के इस कदम पर चाइना इंटरनेशनल रेडियो का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून और संबंधों के बुनियादी मापदंड का गंभीर उल्लंघन है। चीनी मीडिया ने इसे चीन के अंदरूनी मामलों में गंभीर हस्तक्षेप बताया है।
2. उइगर मुसलमानों पर चीन का अत्याचार
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि चीन उइगर मुसलमानों की आवाज को दबा रहा है। उन्हें बिना कारण कैद करके रखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ह्यूमन राइट्स के पक्षधर माने जाते हैं। अमेरिकी संसद में इस मुद्दे पर बिल भी पास हो चुका है। ऐसे में यह मसला चीन के साथ मीटिंग में उठ सकता है।
अमेरिकी मॉनिटरिंग ग्रुप के मुताबिक, शिनजियांग में चीनी अत्याचार का शिकार होने वाले उइगर मुसलमानों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है। दूसरी तरफ चीन इन आरोपों से इंकार करता है। चीन ने पूर्वी तुर्कस्तान पर 1949 में कब्जा कर लिया था। उइगर मुसलमान तुर्किक मूल के माने जाते हैं। शिनजियांग में कुल आबादी का 45 फीसदी उइगर मुसलमान हैं। 40% आबादी हान चीनी हैं।
चीन ने तिब्बत की तरह शिनजियांग को स्वायत्त क्षेत्र घोषित कर रखा है। पिछले साल ही अमेरिका ने उइगर मुसलमानों पर अत्याचार में कथित रूप से शामिल 28 चीनी संस्थानों को ब्लैकलिस्ट कर दिया था। इन संस्थानों को निगरानी सूची में डाल दिया गया था। ऐसा करने से सरकार की मंजूरी के बगैर इन कंपनियों से कोई भी सौदा करने पर पाबंदी लग जाती है।
3. कोरोना को लेकर चीन पर विश्वास की कमी
अमेरिका और चीन के बीच बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा कोरोना महामारी हो सकती है। कोरोना ने अमेरिका को ही सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। अमेरिका अब भी चीन के वायरस से जुड़े डेटा पर भरोसा नहीं करता। डोनाल्ड ट्रम्प तो कोरोना का चीनी फ्लू कहकर इसके लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं।
हाल में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की एक टीम ने चीन के वुहान का दौरा किया था। माना जाता है कि कोरोना वायरस यहीं से पूरी दुनिया में फैला है। अभी टीम ने रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है। चीन ने जिस तरह कोरोना पर काबू पाया और बाकी देश अब भी इससे जूझ रहे हैं, उससे चीन को शक की नजर से देखा जाता है।
यही वजह है कि अमेरिका कोरोना से लड़ाई में चीन के बजाय भारत का साथ ले रहा है। हाल में हुई 4 देशों के ग्रुप 'क्वाड' की बैठक में अमेरिका और भारत ने मिलकर वैक्सीन बनाने के लिए सहमति जताई है। इसके तहत दोनों देशों की कंपनियां इस साल के आखिर तक वैक्सीन के 100 करोड़ डोज तैयार करेंगी।
4. साउथ चाइना सी में चीन की दादागीरी
साउथ चाइना सी में चीन की दादागीरी अमेरिका को कभी रास नहीं आई। दोनों देश इस मसले पर कई बार एक दूसरे को धमका भी चुके हैं। दोनों देशों की सेनाएं इस इलाके में एक्सरसाइज करती हैं। इस वजह से उनमें टकराव की स्थिति बन जाती है। पिछले साल साउथ चाइना सी में चीन की मिलिट्री एक्सरसाइज के बीच अब अमेरिका ने भी 2 एयरक्राफ्ट कैरियर भेज दिए थे। चीन इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।
अमेरिका इसका विरोध कर विवादित क्षेत्र में चीन की मिलिट्री एक्सरसाइज को उकसाने वाला काम बताता है। वहीं चीन का कहना है कि साउथ चाइना सी से अमेरिका का कोई लेना-देना नहीं है। उसे इस मामले से दूर रहना चाहिए। डोनाल्ड ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन ने तो यहां तक कहा था कि साउथ चाइना सी पर पूरी दुनिया का हक है। इस मुद्दे पर हम केवल अमेरिकी ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय हितों की भी रक्षा करेंगे। अमेरिका ने फिलीपींस को साउथ चाइना सी में मिलिट्री बेस बनाने में मदद देने का भी भरोसा दिया था
5. ताइवान पर चीन के कब्जे का डर
दक्षिण एशिया में अमेरिका ताइवान को मदद देकर चीन को काबू में रखने की रणनीति पर चलता है। 1949 में ताइवान चीन से अलग होकर नया देश बना था। चीन इस पर अपना कब्जा जताता है।
इस लड़ाई में अमेरिका ताइवान के साथ है। वह उसे हथियार समेत हर मुमकिन मदद देने का वादा कर चुका है। डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी कीथ क्रेच ताइवान की राजधानी ताइपेई पहुंचे थे। चीन इससे झुंझला गया था।
1979 के बाद यह पहला मौका था जब अमेरिका के सेक्रेटरी लेवल का अफसर ताइवान पहुंचा था। इसके पहले तक ताइवान और अमेरिका के डिप्लोमैटिक रिलेशन्स तो थे, लेकिन इस स्तर के अधिकारी अमेरिका ताइवान नहीं भेजता था। साउथ चाइना सी में चीन ताइवान समेत कई छोटे देशों को धमकाता रहता है।
ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन तो चीन की धुर विरोधी मानी जाती हैं। साई दूसरी बार ताइवान की राष्ट्रपति चुनी गई हैं। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में वन चाइना पॉलिसी को मानने से मना कर दिया था। इसके बाद चीन ने ताइवान से सभी तरह के संबंध तोड़ लिए थे। चीन हमेशा से ताइवान को अपना हिस्सा मानता रहा है।


Leave Comments
एक टिप्पणी भेजें